कल जब मैने अजय शर्मा का लेख पढ़ा तो मुझे भारत की विकास रथ पर चलने की नेतोऊ दुआरा किए गए जुठे वादे का पता चल जाता है। ये अकेले अजय शर्मा की नही हम सब की यही परेशानिया है मै भी एक इंटरनेशनल कंपनी मै कार्य करता हु। ये डर मुझे भे हमेशा लगा रहेता है की कल मै ऑफिस आऊंगा या नही एक अंजान से डर मै हम जीने के लिए मुजबुर हो रहे है। भारत सरकर रोज़ नये नये कहानिये सुना कर हमरे डर को कम करने की कोशिश तो कर रही है पर उस का कोई हल नही निकल पा रही है।
अगर ये घटना मेरे साथ घटती तो शायद मेरे पास आत्महत्या या सड़क पर कुछ छोटा मोटा काम करने के सिवा कोई दूसरा विकल्प नही बचता। वजहे सीधी सी है की हमरे हिंदुस्तान मै काम करने वाला एक होता है और खाने वाले ज्यादा ये परेशानी मेरे साथ भी मेरे घर में हम आठ लोग है पर उन मै से सिर्फ़ मै ही काम करता हु। किराया जो हर महीने मकान मालिक को देना ही देना है साथ में खाने पीने और सब खेर्चे इन सब के बंदोबस्त होने के बाद ही हम सेविंग के बारे मै सोच सकते है मगर बैंक मै महीने मै ५०/१०० रूपए ही बचते है हम मध्यम परिवार वाले क्या करे।
बस भगवान के भरोसे ही हम लोगो की ज़िन्दगी चल रही है कल के बारे मै पता नही क्या होगा। कंपनी पहुचने से पहले रोज़ ऑफिस के दोस्तों से बात होती है "भाई सब ठीक है ना .... कही तेरा या मेरा नाम तो नही है लिस्ट मै "अगर ऐसा हो गया तो हम क्या करेंगे पता नही.................?
Tuesday, February 17, 2009
'तलाश अभी जारी है..........?
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